नारी सशक्तिकरण की दिशा में कदम – राजनैतिक बयानबाजी से यथार्थ तक

नारी सशक्तिकरण एक ऐसा मुद्दा रहा जो कभी किसी जमाने में सामजिक मुद्दा था लेकिन बाद में इसे पूर्णतयः राजनैतिक मुद्दे का रूप दे दिया गया | मुगलों के कब्जे के पहले के भारत में नारी शिक्षा और नारी शक्ति के कई उदाहरण रहे हैं | परन्तु मुगल राज का सबसे ज्यादा नुकसान महिलाओं को ही हुआ | अंग्रेज महिलाओं के प्रति थोड़े उदारवादी थे तो अंग्रेज शासन में थोड़ी बहुत स्थिति बदली | लेकिन आजादी के बाद तो महिलाओं को वही स्थान वापस मिलना चाहिए था जो कि गुलामी के पहले के भारत में था परन्तु यह इस देश का दुर्भाग्य है कि जो समस्या राजनैतिक मुद्दा बनायीं जा सकती है उनका समाधान करने का प्रयास कम ही नेता करते हैं क्योंकि अगर समस्या का समाधान कर दिया तो फिर अगली बार वोट किस वादे और मुद्दे पर मांगेंगे | आजादी के बाद इस देश में कई बार कई राजनैतिक दलों का नेतृत्व महिलाओं के हाथ में रहा परन्तु उनमें से भी कई को शायद महिला सशक्तिकरण की जगह अपनी राजनीति चलाने में ही ज्यादा रूचि थी | पिछले कुछ सालों के ही उदाहरण अगर देखें तो आप ही बताइये कि कितनी महिला नेताओं को महिला सशक्तिकरण का मुद्दा गंभीरता से उठाते देखा है ? कई महिला नेताओं के मुख से आपने गरीबी, दलित, पिछड़ा, सेकुलरिज्म, साम्प्रदायिकता आदि जैसे विभिन्न शब्द और मुद्दे सुने होंगे परन्तु महिला सशक्तिकरण का विषय कितनी बार सुना | यही हाल महिला पत्रकारों का भी रहा | यह कहना गलत नहीं होगा कि राजनीति और पत्रकारिता के अलावा बाकि सभी क्षेत्रों में अपनी योग्यता साबित करने वाली महिलाओं का महिला सशक्तिकरण के प्रति झुकाव महिला नेताओं और पत्रकारों से ज्यादा ही रहा जबकि महिला सशक्तिकरण के प्रति जागरूकता लाने में महिला नेता और पत्रकार एक बहुत ही बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकतीं थीं |

कांग्रेस पार्टी ने इस देश पर लम्बे समय तक सरकारें चलायीं परन्तु आजादी के इतने साल बाद भी आज तक महिला सशक्तिकरण इनका चुनावी मुद्दा है, वो भी तब जब कि यह पार्टी पर्याप्त समय तक इंदिरा गाँधी और सोनिया गाँधी के नेतृत्व में रही | यदि आजादी के इतने साल बाद भी देश में नारी को वो स्थान नहीं मिल पाया जो उसे मिलना चाहिए था तो यह नाकामी कांग्रेस सरकारों के रिपोर्ट कार्ड से नहीं हटायी जा सकती है | अन्य पार्टियों की तरह कांग्रेस के पास यह बहाना भी नहीं है कि उनको पर्याप्त समय नहीं मिला | आखिर और कितना समय चाहिए था |

मोदी सरकार से जनता को बहुत सारी उम्मीदें हैं और इसी वजह से पिछले लोकसभा चुनाव में जनता ने प्रचंड बहुमत से यह सरकार बनवायी | वैसे तो मोदी सरकार के मंत्रिमंडल में महिलांओं को स्थान पहले भी मिला था लेकिन कल के मंत्रिमंडल विस्तार में निर्मला सीतारमण को रक्षा मंत्रालय दिया जाने से मोदी सरकार में महिलाओं की भागीदारी को एक नया बल मिला | विदेश मंत्रालय में पहले ही सुषमा स्वराज अपनी योग्यता से यह सिद्ध कर चुकी हैं कि बड़े और महत्वपूर्ण पदों पर आने का मौका मिले तो महिलाएं भी पूरी योग्यता के साथ उस पद एवं जिम्मेदारी को निभा सकती हैं | निर्मला सीतारमण पहले पार्टी में भी कई महत्वपूर्ण पदों पर अपनी योग्यता साबित कर चुकी हैं और इस फेरबदल के पहले भी वो मोदी सरकार में मंत्री थीं | उस मंत्रालय में उन्होंने अपनी योग्यता साबित की या नहीं यह बात उनको रक्षा मंत्रालय के रूप में मिले प्रमोशन से साफ पता चलती है | यहाँ यब भी बात प्रशंशा और स्वागतयोग्य है कि ख़राब परफॉरमेंस देने पर इस सरकार ने महिला मंत्रियों एवं अन्य महिला पदाधिकारियों पर भी समय समय पर वैसी ही कार्यवाही की जैसी कि पुरुषों को झेलनी पड़ी है | हालाँकि कुछ मौकों पर मोदी सरकार में भी महिलाओं को दिए गए अवसर और परफॉरमेंस अच्छी न होने पर उनके खिलाफ की जाने वाली कार्यवाही में जातिवादी समीकरण भी हावी दिखाई दिए | कुछ मौकों पर लगा कि फैसला लेने का आधार सिर्फ जातिवाद ही था और उसका महिला सशक्तिकरण से कोई सम्बन्ध नहीं था | लेकिन फिर भी अब तक लिए गए सारे फैसलों को मिलाकर देखें तो मोदी सरकार की तारीफ ही की जानी चाहिए |

आज की शिक्षित महिला अपने अधिकारों को जानती है और लगभग हर क्षेत्र में अपनी योग्यता साबित कर रही है | ग्रामीण इलाकों और ऐसे इलाकों जहाँ आज भी महिला शिक्षा पर ज्यादा जोर नहीं दिया जा रहा वहाँ सरकारों को जागरूकता लाने और महिला शिक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाने की जरुरत है | कुछ लोग धर्म के नाम पर भी महिलाओं पर होने वाले अत्याचार को सही ठहराते हैं, ऐसे लोगों का विलाप दरकिनार करके सभी राजनैतिक दलों को महिला सशक्तिकरण के लिए मिलकर काम करना चाहिए | दुर्भाग्य है कि आज के भारत में भी तीन तलाक पर सरकार और सुप्रीम कोर्ट की राय / आदेश का विरोध करने वाले लोग हैं और ये लोग हलाला जैसी कुप्रथा का भी समर्थन कर रहे हैं | जिस तरह से मुस्लिम महिलाओं ने इस्लाम के ठेकेदारों के विरोध की परवाह न करते हुए तीन तलाक का विरोध किया वो प्रशंसनीय है और यह भी साबित करता है कि भारत अब महिला सशक्तिकरण के प्रति सही दिशा में आगे बड़ रहा है और बिना किसी धर्म और जाति के भेदभाव के सभी महिलाओं को वो बल दे रहा है कि वो नारी को कमजोर समझने वाले लोगों के खिलाफ कड़ी हो सकें | बहुत हुआ है और बहुत होना अभी बाकी है | उम्मीद करता हूँ जो भी कुछ अभी होना बाकि रह गया है वो भी जल्दी होगा और जल्द ही इस देश में नारी को अपना वो स्थान वापस मिलेगा जो कि गुलामी के पहले वाले भारत में था |

( फोटो साभार – The Indian Society )