क्या है गुजरात चुनाव का महत्व और क्यों सभी इसे हर हालत में जीतना चाहते हैं

गुजरात चुनाव में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने सभी संभव दाव पेंच का इस्तेमाल किया | पहले दिन से स्पष्ट था कि दोनों की पक्ष हर हाल में यह चुनाव जीतना चाहते हैं भले ही इस के लिए उनको कुछ भी करना पड़े | कांग्रेस ने पिछले कई साल से हिन्दू धर्म, हिन्दुओं एवं मंदिरों में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई परन्तु इस बार राहुल गाँधी गुजरात में मंदिर मंदिर घुमते नजर आये | भाजपा नेता भी कभी अजान पर अपने भाषण को विराम देते नजर आये तो कभी हिंदुत्व के झंडे को ऊंचा करते भी नजर आये तो कभी विकास के मुद्दों को उठाते नजर आये | विकास से शुरू हुई यह बहस मंदिर-मस्जिद, हिन्दू-मुसलमान, ऊंच-नीच और जातीय समीकरणों पर आकर अटक गयी | कहना गलत नहीं होगा कि गुजरात में दोनों पक्षों ने अपनी पूरी ताकत झोंकने की कोशिश की जबकि ऐसा शक्ति प्रदर्शन पिछले कई चुनावों में शायद उस स्तर का नहीं हुआ | ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि गुजरात चुनाव का एक सीधा और महत्वपूर्ण असर २०१९ के लोकसभा की चुनावी गणित पर होना था | अभी तक के हालात ऐसे हैं कि यह अब लगभग तय है कि भाजपा २०१९ में भी स्पष्ट बहुमत प्राप्त कर सकती है और पुनः एक मजबूत सरकार बना सकती है और वहीँ विपक्ष इस समय २०१४ से भी ज्यादा कमजोर नजर आ रहा है | लेकिन गुजरात चुनाव के कुछ नतीजे इस स्थिति में एक बड़ा बदलाव ला सकते थे |

गुजरात चुनाव के अलग अलग नतीजों का २०१९ के लोकसभा चुनावों पर क्या असर हो सकता था उस पर मेने अपनी राय लिखने के लिए इस चुनाव के नतीजों को कुछ अलग अलग स्थितियों में बांटा है |

१) पहला – भाजपा १५० से ज्यादा सीट
२) दूसरा – भाजपा १२०-१४० सीट
३) तीसरा – भाजपा १०५-१२० सीट
४) चौथा – भाजपा ९२-१०५ सीट
५) पांचवा – कांग्रेस की जीत और भाजपा की हार

पहले केस में भाजपा का आत्मविश्वाश और भी ज्यादा बढ़ेगा और विपक्ष के आत्मविश्वाश में और गिरावट आएगी | सम्पूर्ण विपक्ष के संगठित होकर महागठबंधन बनाने की सम्भावना भी कम ही हो जाएगी क्योंकि कांग्रेस की लगातार हार के बाद कई पार्टियाँ कांग्रेस के साथ हाथ मिलाकर जनता की नाराजगी झेलने से बेहतर इस पार्टी से दूरी बनाकर अपनी किस्मत आजमाना चाहेंगी | लगभग यह तय हो जायेगा कि २०१४ की तरह २०१९ भी भाजपा की तरफ एकतरफा चुनाव रहेगा, हो सकता है कि भाजपा खेमे को २०१४ से भी बड़ी जीत मिल जाये |

दूसरे केस में वर्तमान स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आता और आज के जो हालात हैं वो वैसे ही बने रहते |

तीसरा केस भाजपा के लिए थोड़ा परेशानी लाएगा क्योंकि भाजपा ने १५० सीट से ज्यादा सीट जीतने का दावा किया हुआ है और इस स्थिति में यह साबित होगा कि या तो उनकी रणनीति और आंकलन में कोई कमी रह गयी या फिर कांग्रेस की रणनीति ने उनको यह चोट पहुंचाई है या फिर अब मोदी लहर शायद अब वैसी नहीं रही जैसी कि भाजपा को उम्मीद थी | इस से विपक्ष के आत्मविश्वाश में थोड़ी बढ़ोत्तरी जरूर होती परन्तु इस स्थिति का भी २०१९ के लोकसभा चुनावों पर कोई बड़ा प्रभाव नहीं पड़ना है क्योंकि २२ साल से इस राज्य में सत्ता में बैठी भाजपा इस स्थिति में भी कुछ खास कमजोर नजर नहीं आएगी और जो थोड़ा बहुत नुकसान होगा भी वो आने वाले समय में अन्य राज्यों के चुनावों के नतीजों से ठीक कर लिया जायेगा |

चौथा केस भाजपा के लिए अच्छा नहीं रहेगा | इस से विपक्ष के आत्मविश्वाश में काफी बढ़ोत्तरी होगी | महागठबंधन में कई पार्टियाँ आ जाएँगी | हालाँकि यहाँ कुछ मजबूत क्षेत्रीय पार्टियाँ शायद सीटों के समझौते और महागठबंधन के नेता पद यानि कि प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी को लेकर होने वाले विवादों की वजह से महागठबंधन से दूरी बना सकती थीं | इस स्थिति में २०१९ में विपक्ष के लिए यही एक बड़ी जीत होगी कि वो किसी तरह भाजपा को २२० से कम सीट पर रोक दे | भाजपा की कई सहयोगी पार्टियाँ भी शायद इस दिन का इन्तजार कर रहीं हैं ताकि गठबंधन में उनका प्रभाव बड़े और वो भी भाजपा पर मनचाहे दबाव डाल पाएं | ऐसी स्थिति में भाजपा गठबंधन सरकार बना जरूर लेगा परन्तु मोदी जी उसे उस तरह से नहीं चला पाएंगे जैसे कि वो अभी चला रहे हैं और फिर सरकार में आये इन परिवर्तनों का प्रभाव २०१९ के बाद होने वाले राज्य चुनावों पर भी पड़ेगा | और इसका परिणाम यह होगा कि २०२४ तक विपक्ष को फिर से मजबूत होने का मौका मिलेगा और शायद विपक्ष की यह मजबूती २०२४ के चुनावों के परिणामों में गणित बदल भी दे और भाजपा को वापस विपक्ष में भेज दे |

पांचवा केस – हालाँकि मुझे लगता नहीं कि यह स्थिति आएगी और हाल ही में हुए एग्जिट पोल भी यही इशारा कर रहे हैं कि यह स्थिति नहीं आएगी | परन्तु यदि ऐसा होता है तो इस स्थिति में भाजपा के आत्मविश्वाश को गहरा आघात पहुंचेगा और विपक्ष के आत्मविश्वाश में कई गुना बढ़ोत्तरी | कांग्रेस खुद को महागठबन्धन के लीडर के तौर पर पेश कर पायेगी | सभी मोदी विरोधी बड़े और मजबूत राजनैतिक दल इस स्थिति का लाभ उठाने के लिए महागठबंधन का हिस्सा बन जायेंगे | विपक्ष की यह एकजुटता और आत्मविश्वाश २०१९ में २००४ जैसे नतीजे ले आएगा |

गुजरात चुनावों को लेकर कोई भी दावे किये गए हों लेकिन इसके नतीजों से २०१९ पर जो प्रभाव पड़ सकता था उसका अंदाजा सभी राजनैतिक दलों को था और इसी वजह से वो अपने अपने स्तर पर पूरी ताकत झोंके हुए थे | जिन पार्टियों का गुजरात चुनावों से कोई लेना देना भी नहीं था वो भी किसी न किसी तरह भाजपा को कमजोर करने के प्रयास में थे | हर संभव दाव पेंच का इस्तेमाल किया गया और हर सम्भावना को अपने पक्ष में नतीजे बदलने के लिए प्रयास किया गया | यहाँ कांग्रेस के नेताओं ने फिर से कुछ ऐसी मूर्खताएं कर दीं जिन से कि उनकी पार्टी द्वारा की गयी मेहनत पर लगभग पानी भी फिरा, चाहे वो मणि शंकर अय्यर की मोदी जी पर नीच शब्द वाली टिप्पणी हो या फिर से कांग्रेसी नेताओं द्वारा पुनः चायवाला शब्द का प्रयोग या फिर अयोध्या के राम मंदिर केस की तारीख को लेकर कपिल सिब्बल की कोर्ट में दी गयी दलील | कांग्रेस पार्टी वैसे भी राहुल गाँधी कि छवि और अपरिपक्वता से जूझती ही रहती है और उसी पर इनके वरिष्ठ नेताओं द्वारा की गयीं ऐसी गलतियां भी बचाव का मौका लगभग खत्म ही कर देतीं हैं | भाजपा पहले की तरह संगठित और तैयार नजर आयी | अब इस सब की जमीनी हकीकत तो १८ दिसंबर के नतीजों में ही सामने आएगी लेकिन जिस तरह के नतीजे एग्जिट पोल में आये हैं यदि वो सत्य हो जाते हैं तो विपक्ष के लिए आने वाला समय और भी ज्यादा कठिन है और भाजपा के लिए आसान |