कांग्रेस द्वारा कर्णाटक के लिए अलग ध्वज की मांग के पीछे की गन्दी राजनीति

कर्णाटक की कांग्रेस सरकार ने कर्णाटक राज्य के लिए एक अलग ध्वज बनाने की योजना पर विचार करना शुरू किया है | फिलहाल जम्मू कश्मीर इकलौता राज्य है जिसका अपना अलग एक ध्वज है | जम्मू कश्मीर में अलग ध्वज और अलग संविधान का क्या परिणाम हुआ यह सब जानते ही हैं | क्या इसी तरह की अलगाववादी सोच को अब कर्णाटक मैं पैदा करके यहाँ की जनता पर थोपे जाने का षड़यंत्र बनाया जा रहा है ? ध्वज की मांग कर ही दी है तो क्या अब अगली मांग कर्णाटक के लिए अलग संविधान की मांग होगी ? क्या होगा यदि दूसरे राज्य भी इसी तरह की मांग करने लगे तो ? आज के राजनैतिक हालात में क्या किसी एक डिज़ाइन या रंग पर सहमति बनायी जा सकती है ? क्या होगा यदि सेक्युलर जमात हरे इस्लामिक झंडे की और हिन्दुत्वादी लोग भगवा झंडे की मांग करने लगें तो ? क्या होगा यदि किसी राज्य के झंडे के रंग या डिज़ाइन से विपक्ष खुश नहीं है और वो सत्ता में आकर उस ध्वज को बदलकर एक अपना नया ध्वज बना दे, क्या हर ५ साल में राज्य की जनता के हाथ में एक नया ध्वज पकड़ा दिया जायेगा ? क्या इस सब से जनता में आपस में मतभेद और लड़ाई नहीं होगी ? क्या इस तरह के अलगाववादी फैसलों से देश एक गृहयुद्ध की ओर नहीं बढ़ेगा ? एक ध्वज, एक कानून से देश की जनता ज्यादा खुश और एकता के साथ रहेगी या फिर अलग अलग ध्वज और अलग अलग कानून से ?

कर्णाटक में अनौपचारिक रूप में सांस्कृतिक प्रतीक के तौर पर तिरंगे के साथ साथ एक अलग झंडे का प्रचलन कोई नया नहीं है परन्तु यह अलग ध्वज आधिकारिक तौर पर राज्य का सरकारी ध्वज नहीं है | इसका उपयोग कुछ उसी तरह से किया जाता है जैसे कि हिन्दू त्योहारों में भगवा ध्वज और मुस्लिम त्योहारों में हरा इस्लामिक ध्वज | लेकिन अब कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने इस ध्वज को कर्णाटक का सरकारी मान्यता प्राप्त आधिकारिक ध्वज बनाने की योजना पर काम करना शुरू किया है | जाहिर सी बात है कि यदि कांग्रेस जैसी पार्टी जब इस तरह का कोई कदम उठाये तो उसके पीछे की राजनीति जानने की आवश्यकता होती ही है | अचानक से इस मांग का उठाया जाना एक गहरी राजनैतिक चाल है |

कर्णाटक में कांग्रेस सरकार के भ्रष्टाचार एवं अकर्मठता की वजह से जनता में कांग्रेस के खिलाफ बहुत रोष है | कांग्रेस को अच्छे से पता है कि जनता अगले चुनाव में उसके खिलाफ वोट देगी | मुद्दों के मामले में तो कांग्रेस में अकाल पड़ा हुआ है क्योंकि बुद्धिमान एवं योग्य नेताओं को तो इस पार्टी ने बहुत पहले ही बाहर का रास्ता दिखा दिया है और अब तो चापलूसों का ही बोलबाला है | पहले कर्णाटक में हिंदी विरोधी आंदोलन भड़काया गया और अब यह अलग ध्वज का विवादित मुद्दा गर्म कर दिया गया | कारण सिर्फ तीन, पहला यह कि जनता को दुसरे मुद्दों में ऐसा फसा दो कि आज भ्रष्टाचार एवं अकर्मठता का मामला ही भूल जाए, दूसरा यह कि भाजपा की सिर्फ उत्तर भारतीयों की पार्टी वाली छवि बनाकर दक्षिण भारत में उसके खिलाफ माहौल बनाया जाये और तीसरा मुख्य कारण वही पुराना कि फूट डालो और राज करो | पहले भाषा के विवाद और अब इस अलग ध्वज के मुद्दों पर भी प्लान यही था | पता था कि केंद्र सरकार इस अलग ध्वज की मांग का विरोध करेगी और फिर इस विरोध को ढाल बनाकर यह साबित कर दिया जायेगा कि भाजपा कर्णाटक की सांस्कृतिक मान्यताओं की विरोधी है और सिर्फ उत्तर भारत का एजेंडा थोपना चाहती है | भाषा के विवाद में भी यही कहा गया कि भाजपा अपनी उत्तर भारतीय सोच को दक्षिण भारत पर थोपना चाह रही है |

सबसे बड़ी बात यह है कि अलग ध्वज का उपयोग करने से कर्णाटक की जनता को क्या लाभ होगा ? कुछ नहीं | इस मांग से किस को सब से ज्यादा ख़ुशी होगी, जनता को या देशद्रोही आजादी गैंग को ? उम्मीद है कि कर्णाटक की जनता कांग्रेस की इस चाल को समझेगी और अगले चुनाव में इन सब बातों को याद रखते हुए वोट करेगी | देश को तोड़ने की कोशिश करने वालों के साथ किसी भी तरह का कोई समझौता नहीं होना चाहिए | ऐसे लोगों को तो लगातार कमजोर बनाने की आवश्यकता है न कि वोट देकर मजबूत बनाने की |

हालाँकि भाजपा के साथ साथ कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने भी इस अलग ध्वज की मांग का विरोध करके कर्णाटक कांग्रेस के सपनों पर फिलहाल पानी फेर दिया है | कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने इस मांग का विरोध जनता के विरोध की वजह से किया या सच में केंद्रीय नेतृत्व से बिना पूछे ही कर्णाटक कांग्रेस ने यह मुद्दा उठाया यह तो आने वाला समय ही बताएगा |