कविता – फिर आज हिमालय पर मुझे बुलावा आया है

तेरे गौरव में हम माँ शीश उठा कर चलते है।
तेरे ममतामयी आँचल में हम कदम मिला बढ़ चलते है।।

गगन चूमता तेरा मस्तक जो हिमालय कहलाता है।
बहती धारा तेरा आँचल सीच धरा  को जाता है।।

तुजसे हम है ओ माता और तुझपे हीे मिट जायेंगे ।
कभी न झुके न झुकेंगे अभी हम हँस कर शीश कटाएँगे।।

फिर आज हिमालय पर मुझे बुलावा आया है।
कुछ बंदूके कुछ बम लेकर एक दानव उस पार से आया है।।

जिस भूमि ने जनम दिया श्रीराम से बलशाली को।
नीतिकुशल रहैं श्रीकृष्ण जहा हों, सब दुष्टों पर जो भारी हों।।

सीमा की रक्षा करता मैं उस सिंधु धरा से आया हूं।
एक इंच न घुसने दूंगा तुझे ये बात बतलाने आया हूं।।

याद कर सत्तावन को जब हमने. तेरा हाथ उखाड़ा था।
कश्मीर अभी भी है अपना पर बंगाला तू हरा था।।

आत्मावलोकन कर ले तू समय तेरा फिर भारी है।
अपनी करनी से जो तू न सुधरा तो अब फिर  सिंध बलोच के बारी है।।