उ.प्र. चुनाव से पहले ही हार मान चुकी कांग्रेस ने ब्राह्मण वोट भाजपा से छीनने के लिए रचा खेल ?

वैसे तो कम या ज्यादा लेकिन लगभग हर एक राज्य में कई नेता आज के दौर में भी योग्यता की जगह सिर्फ जाति के आधार पर ही ताकतवर बने हुए हैं लेकिन इस जातिवादी राजनीति का उत्तर प्रदेश एवं बिहार के नेताओं में प्रभाव कुछ ज्यादा ही है | उ. प्र. एवं बिहार के कई नेताओं को आप आज भी जनता की समस्याओं की जगह आप अपनी जाति और उस के वोट बैंक की संख्या के बारे में चर्चा करते पाएंगे | बिहार के चुनाव को किस तरह लालू प्रसाद यादव ने अगड़ा बनाम पिछड़ा बना दिया था आपको याद ही होगा | मायावती भी विकास से ज्यादा दलित, हरिजन आदि शब्द बोलती रहतीं हैं | यही हाल मुलायम सिंह यादव का भी है, वो पिछड़ा और मुस्लिम आदि शब्दों को विकास से ज्यादा अहमियत देते दिखाई देते हैं |

फिलहाल देश में कांग्रेस उस दयनीय स्थिति में पहुँच चुकी है जहाँ कि वो भाजपा की हार को ही अपनी जीत मानकर खुश हो लेती है | खुद तो जीतना अब इनके वश में रहा नहीं तो बस अब खेल यही है कि किसी तरह से भी बस भाजपा को सरकार बनाने से रोका जाये | किस तरह कांग्रेस ने बिहार में भाजपा को रोकने के लिए बने गठबंधन में अपमानजनक समझौता किया आपको याद ही होगा | दिल्ली में भी पूरे चुनाव में यह लग रहा था कि कांग्रेस शायद जानबूझकर चुनाव हारने का प्लान बनाये बैठी है और कोशिश में है कि उस का वोटबैंक आम आदमी पार्टी को मिले |

इस जातिवादी राजनैतिक दाव पेंच में अब एक नया खेल खेला है कांग्रेस ने | उत्तर प्रदेश में हर एक व्यक्ति को पता है कि कांग्रेस का उत्तर प्रदेश में अब कोई जनाधार नहीं बचा है और आने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से किसी को कुछ उम्मीद नहीं है | उत्तर प्रदेश में आने वाले चुनावों में सम्भावना व्यक्त की जा रही थी कि ब्राह्मण वोट भाजपा को मिलेगा | अब भाजपा का सिर्फ ब्राह्मण वोट काटने से कांग्रेस प्रदेश में सरकार तो बना नहीं लेगी लेकिन यदि शीला दीक्षित के नाम पर कांग्रेस भाजपा से ब्राह्मण वोट का एक अच्छा हिस्सा दूर ले जा सकी तो यह सीधे तौर पर बसपा और सपा को फायदा पहुंचाएगा | उ. प्र में यदि भाजपा जीत जाती है तो आने वाले समय में राज्य सभा में काफी मजबूत हो जाएगी और इस से कांग्रेस के रही सही दादागिरी भी ख़त्म हो जाएगी | जनहित के सारे बिल बिना कांग्रेस की मर्ज़ी के भी पास हो जायेंगे | यही कारण है कि कांग्रेस किसी भी तरह से भाजपा को उ. प्र. में सत्ता में आने से रोकना चाहेगी |

लोकसभा चुनावों में जिस तरह उ. प्र. की जनता ने जाति का खेल भुलाकर मोदी जी के नेतृत्व को जबरदस्त समर्थन दिया था उस को देखकर लगता तो नहीं कि आने वाला चुनाव कोई भी पार्टी सिर्फ जातीय समीकरणों के आधार पर जीत पाएगी | यदि भाजपा यह चुनाव लोकसभा की तरह जीतना चाहती है तो फिर भाजपा को पूरी कोशिश करनी होगी कि वो जातीय राजनीति में न फंसे और सिर्फ साफ़ एवं अच्छी छवि वाले तथा योग्य उम्मीदवारों को ही टिकट दे | सपा और बसपा कितना भी सुधरने का दिखावा कर लें अंत में ये दोनों पार्टियां जातीय राजनीति को ही हथियार बनाएंगी और कोशिश करेंगी कि इनका वोट बैंक भाजपा को वोट न डाले | हिंदुत्व की बात आते ही इन पार्टियों को बेचैनी इसी वजह से होने लगती है कि यदि हिन्दू वोट एक हो गया और भाजपा को मिल गया तो फिर इन दोनों पार्टियों की दुर्गत हो जाएगी | ये दोनों पार्टियां यही चाहेंगी कि हिन्दू वोट कई जातियों में बँट जाए ताकि ये आसानी से अपने जातीय समीकरणों का खेल रच पाएं |

खैर, अभी उत्तर प्रदेश चुनावों में काफी समय है | अंतिम फैसला जनता को ही लेना है कि वो जाति के नाम पर वोट डालना पसंद करेगी या विकास के नाम पर | देश को इतने सारे प्रधानमंत्री देने वाला उत्तर प्रदेश आज भी विकास की दौड़ में काफी पिछड़ा हुआ है और इस का कारण सिर्फ और सिर्फ जातीय आधार पर ताकतवर बने नेता हैं | जनता ने यदि इस बार जातीय समीकरणों की जगह राष्ट्रहित को प्राथमिकता दी तो उत्तर प्रदेश भी विकास की राह में जरूर आगे बढ़ेगा |